अंतर्व्यथा

मन के कोने में बैठी, छोटी सी इक प्यास थी,
जीने की अभिलाषा थी, उड़ने की आस थी,
कैसी प्यारी थी वो बातें, कैसा अनूठा प्यार था,
भावना थी, हृदय था, समर्पण अपार था ।
जब कोई डर सताता, आँचल में छुप जाती थी,
उछल कूद कर हँसते गाते, कितना मैं बतियाती थी,
कांटो पर चलते थे वो, फूलों पर मैं सो जाती थी,
जीवन के हर दुःख को सह कर, वो हरदम मुस्काते थे,
मुझे कष्ट से बचा बचा कर, प्यार से सहलाते थे,
धूम धाम से  विदा किया जब, मन ही मन  रो जाते थे,
अपने ह्रदय के टुकड़े को वे, अपना कह न पाते थे !
आज परायी हो चुकी हूँ, पर कैसे मन मानेगा ?
इस नीरस जीवन का सत्य अब कैसे कोई जानेगा?
जिनके सहारे चलना सीखा, आज स्वयं चल न पाते हैं ,
बुढ़ापा है पर लाठी नहीं है, मन ही मन दुःख पाते हैं ,
कैसी है ये रीत कि बेटी अपनी होकर भी अपनी नहीं ?
कैसा है ये गीत कि शब्द है पर स्वर नहीं..
कैसा है ये समाज जिसमें स्त्री को ही त्याग करना है ..
क्यूँ हर रिश्ते की लिए उसे ही पल पल मरना है ..
जब राम राज्य भी स्त्री को न्याय ना दे सका,
किस ईश्वर से आशा बांध उसे जीते रहना है ?



पात


एक सूखे पेड़ पर एक छोटी सी कोंपल आई,
जगमगाते सूर्य-स्वर्ण में उसने ली एक अंगडाई,
झूमती महकी हवाएं उसको सहलाने लगी,
चहचहाती गाती चिड़ियाँ मन को बहलाने लगी,
धीरे-धीरे वह एक हरित पात बन गई,
जीने की अभिलाषा ही दिन व रात बन गई,
हर क्षण उडान का स्वप्न, उसने प्राणो में संजोया, 
बसंती हवा के इक झोंके से, प्रेम का एक बीज बोया, 
झोंके ने कहा -"आओ तुम्हें उडना सिखाऊँ ,
मौन जीवन में तुम्हारे, कुछ प्रेम के सुर बजाऊँ !"
हो सवार स्वप्नों के रथ में पात ने जब कदम बढाया,
वृक्ष से सम्बन्ध टूटा, मन दुःख से सकुचाया,
अश्रुपूरित वृक्ष ने हँसते - हँसते दिया आशीष,
रक्तरंजित ह्रदय ने भाग्य समझ पी लिया था विष,
यहाँ पितृ से पृथक होकर सूखने लगी थी वह पात,
कभी यहाँ तो कभी वहाँ, उडती गिरती सहती आघात,
एक दिन जब थपेड़े खाती, पहुंची वह वृक्ष के पास ,
सूखे वृक्ष को मरणासन्न पा , टूट गयी उसकी हर आस,
वृक्ष धराशायी हुआ, एक कुल्हाड़ी के वार से, 
हाय कोई घर न बचा, अब क्या था लेना संसार से !
अभी जल विहीन था मन, अश्रु भी न निकल पाया,
तभी हवा का झोंका आया, फिर से सूखी पात को उडाया !
उस पात को बड़े जतन से, दो नन्हे हाथों ने लिया थाम,
निश्छल प्रेम की शीतलता से , दुखों पर अब लगा विराम !
अब नहीं थी कोई उलझन, अब नहीं था मन विह्वल,
अब शुष्क नहीं था जीवन, ह्रदय भी हो गया सजल !

आक्रोश !

जिस दर्द ने मार -मार कर जीना सिखाया,
उससे बड़ा दर्द अब कहाँ से दोगे?
जिन आंसुओं को संजो कर समंदर बनाया,
उस समंदर से मोती क्या छीनोगे?

जिन टुकड़ों को जोड़ कर आइना बनाया,
उस आईने को अब लोहे से क्या फोडोगे ?

जिन पंखों ने टूट टूट कर जुड़ना सीखा,
अब उनको क्या काटोगे , क्या तोड़ोगे?

मस्त पवन के एक झोंके कि मस्ती को,
पिंजर में बाँध तुम कैसे रखोगे?

ऊपर वाले से डरना सीखो मेरे दोस्त,
उसकी लाठी पड़ी तो क्या पकड़ोगे क्या छोडोगे?

अभिलाषा

जिस पथ पर कांटें मिलें , उस पथ पर चलना चाहती हूँ,
दर्द भरे चुभते घावों पर प्यार को मलना चाहती हूँ |

जिस दिशा रुदन सुनाई दे, उस दिशा को मुड़ना चाहती हूँ,
आंसुओं को मुस्कान बना कर, दिलों से जुड़ना चाहती हूँ |

जो धरा है बंध्या हुई, उस धरा पर जीना चाहती हूँ,
सूनी कोख को अमृत से सींच, ख़ुशी को पीना चाहती हूँ |

जिन नैनों में पड़ा हो सूखा, उनमें रहना चाहती हूँ,
प्रेम के आँसू बन पल पल , ह्रदय से बहना चाहती हूँ |

जिधर सूरज अस्त हुआ हो, उधर मैं जलना चाहती हूँ,
आशा का एक लघु दीपक बन, हर दिल में पलना चाहती हूँ |

कश-म-कश

गुम गए बीते वो लम्हे, यादों के पिटारे से,
धुंध में लिपटे हुए थे, ख्वाब कुछ प्यारे से,
जब न ढूँढा था उन्हें, जब थी गुम इक दौड़ में,
जब थी खो चुकी ज़िन्दगी, न जाने किस होड़ में,
तब नही सोचा की मुड के देखना भी रीत है,
आगे ही साज़ नही , पीछे भी जुड़े कुछ गीत हैं,
जिस्म तो है आ गया, रूह कहाँ छूट गई?
गाते गाते ये अचानक लय कहाँ टूट गई?
आज अपनी ही धुनें, क्यूँ परायी हो गयीं?
आज अपने आईने से क्यूँ लडाई हो गई?
कहाँ जाऊं? किससे पूछूं? कौन ये बतलायेगा?
शायद यह सवालों का लम्हा भी यूँही खो जाएगा |

गीत

एक फलक पर आसमान , दूजे पर है साँस की डोर,
दोनों को समेट कर आती ज़िन्दगी की एक हिलोर,
सपनो के रंगीन वो साये याद दिलाती है हवा,
नींद है टूटी पर न छूटी आस की एक बूँद दवा,
उमड़ घुमड़ कर काली बदरी कहती है कुछ गरज कर,
ठंडी-ठंडी बूँदें सुनाती ईश-गीत बरस कर,
साज़ है ठहरे पर है गाती दिल में ठहरी एक भोर,
उठो गाओ,, गुनगुनाओ, जिंदगी देती है ज़ोर !

हे मित्र तुम क्यों रोते हो?

हे मित्र तुम क्यूं रोते हो?
क्यों माया की भूल-भुलैया में खोते हो?
क्यों आखें खुली रख कर भी सोते हो?

क्यों व्यथित हो कोई मित्र नही तुम्हारा?
क्या हुआ जो छूट गया कोई भी साथ प्यारा?
जान लो, है एक परम मित्र सदा ही संग,
लुटा रहा है वह तो, मित्रता के कितने प्यारे रंग !

देखो चारों ओर से सरसराती हवाएं,
अधीर हैं कब तुम्हारे बालों को सहलाएं,
उछलती, कूदती, गाती गुनगुनती कह रही हैं -
'आओ हम तुम उमड़ उमड़ कर झूमें, नाचें गायें। !'

खिलखिलाते रंग-बिरंगे कली कुसुम,
तुम्हारी आभा को देख कहते-'कितने प्यारे हो तुम !',
तुम्हारे रंगों में हम अपने रंग मिलाएं,
आओ खुशबू से सारा जीवन भर जायें !'

देखो तुम्हारे कोमल नैनों को सुख देने,
हरे भरे हो कर बैठे हैं वृक्ष-समुदाय,
कहते हैं - ' आओ मित्र, यह सुख है अमृत है पियो,
आओ हम तुम मन में हरियाली फैलाएं !

ख़ुशी से आहलादित नदी व झरने,
कहते हैं - ' आओ हमारे संग बहने,
जीवन के किसी मोड़ से ना घबराएं,
आओ हम तुम अविरल हो बहते जाएँ !'

सुमधुर कलरव, ये चिड़ियों का संगीत,
हृदय को रंजित करते, ये प्यारे मीठे गीत,
पुकारते हैं - ' आओ हम तुम हवा में घुल मिल जाएँ,
संगीत की तरंगें बन चाहूं ओर लहराएँ !'

झिलमिलाती रवि-रश्मी हो रही विकल है,
प्रस्फूटित हो तुम्हारे हृदय में जगमगाने,
कहती है - " तमस को आशा का सूरज दिखाएं,
आओ अंधकर से प्रकाश की ओर जाएँ।'

सुनो इन ऊँचे हिम-शिखरों की पुकार,-
'चढ़ आओ हम पर मानेंगे आभार,
तुम्हारी इच्छाशक्ति में, हमारी दृढ़ता को मिलाएं,
आओ हम तुम उत्थान की दिशा को जाएँ।'

सुनो रात्रि की शांति में हृदय का स्पंदन,
चंद्र के कोमल प्रकाश से भरा है आँगन,
चाँदनी की हर किरण कहती है -
'आओ शांति के सरोवर में नहाएं,
इस ब्रह्म से उस ब्रह्म की ओर जाएँ !'

दूध के धुले हृदय, ये मासूम चेहरे,
इनके मन पर नही किसी के भी पहरे,
सुनो इन चंचल, कोमल नैनों का इशारा -
' आओ हम तुम खेलें, दुनिया को भूल,
अपनी धुन में गुम हो जायें !'

क्या अब भी व्यथित हो, की कोई मित्र नही तुम्हारा?
अपनी आँखें खोलो, देखो, सारा विश्व तो है तुम्हारा !
हर कण तो प्रेम से भरा है !
उस परम मित्र ने तो तुम्हे कभी नही बिसारा !

फिर, हे मित्र तुम क्यों रोते हो?
क्यों माया की भूल-भुलैया में खोते हो?
क्यों आखें खुली रख कर भी सोते हो?

कहाँ?

शाम से रात तक, रात से सुबह तक,
दौड़ती साँसों न जाने किधर को चली जाती हैं,
कभी सोचती नही, कभी ठहरती नहीं,
कभी बिगड़ती नहीं, कहीं संवरती नही,
कहीं घूमती नही, कभी विचरती नही,
कहीं खोती नहीं, कभी उभरती नही,
एक लय में बस चली जाती हैं,
कहीं एक ही तरफ़, एक ही दिशा में,
जैसे कोई उनका इंतज़ार करता है...
पर कहाँ?

थकान?

कभी सोचा है भला ?
चेहरे की रौनक पर लकीरें कैसे पड़ गई?
कैसे मुस्कुराहट को सीलन जकड गई?
कैसे मिठास में चीनी कम पड़ गई?
कैसे गर्दन ठूंठ सी अकड़ गई?

कैसी है यह थकान? क्यूँ आलाप में ज़ोर नहीं?
क्यूँ है ऐसा लगता की होगी न भोर कहीं?
क्यूँ गिन कर मीलों की दूरी है सर झुक गया?
क्यूँ यह सब सोच कर ही कारवाँ है रुक गया?

हे चिंतित मित्र, ख़ुद को झंझोड़ !
कदम बढ़ा, विचारों का गहरा जाल तोड़ !
यह थकन नही, मृगमरीचिका है !
जान ले, कुछ भी न यहाँ टिका है !

रुकने वाले को समय घसीट कर लायेगा,
हाथों में, पावों में, खरोंचे लगाएगा,
दिल में ज़ख्म लगाकर आना पड़ेगा,
बढ़ते बढ़ते दर्द भी छुपाना पड़ेगा !

जब छोडेगा हर जगह ठहर जाना,
जब खोलेगा बंधन का ताना बाना,
जब गायेगा बहता हुआ तराना,
तभी पायेगा एक अनमोल खजाना,

पानी की तरह जो बह बह कर आगे,
समय की रफ्तार के संग संग भागे,
वही स्वतंत्र है, आनंद की डोर पर,
सागर की गहराई में, अम्बर के छोर पर !

रंग बदलते चेहरों के बीच, अपना रंग खिलाओ !
विजय निश्चित है मानो, झूमते जगमगाओ !
थकान को मिटाओ, शक्ति को जगाओ !
दर्द के झूठ को तोड़ो, बढ़ते चले जाओ !







साँस..

तंग ज़िन्दगी के झुरमुट से, एक छोटी सी साँस निकल आई,
थोडी सी महक में नहाई, थोडी रंगों में मुस्काई,
कुछ देर इधर उधर डोलती, कुछ कूद फांद कर आई,
बूंदों को छुआ, सागर को छुआ, बिजली को छुआ, बादल को छुआ,
एक पल में जाने कितने सितारों से खेली परछाई,
...और फिर, सांझ के डर के मारे, चुपचाप घर लौट आई...

शोर

शोर, शोर, बस शोर ही शोर,
आत्मा भी अब बहरी हो चुकी है,
घनघोर अंधेरे में भी सन्नाटा नही बस शोर है,
सबकुछ सुनकर भी जैसे कुछ न सुना हो,
आसपास जैसे ताना बाना बुना हो,
साँस लेना भी मुश्किल है,
आसपास हर कोई है, पर पास कोई नही, बस शोर है
हर नई सुबह से नई उमंग तो मिलती है,
पर शोर में खो जाती है कहीं,

आँखें पथरा गई हैं,
ह्रदय किसी अनजान कोने में, सहमा सा, चुपचाप धड़क रहा है,
सुबह, शाम, रात में तो कोई अन्तर ही नही बचा ,
अन्दर बाहर ऊपर नीचे, चारों ओर, बस शोर ही शोर !

कहीं किसी का रुदन, सिसकियों का शोर,
कहीं किसी का भड़कना, धमकियों का शोर,
कहीं किसी का चिढ़ना, चिल्लाहट का शोर,
कहीं किसी की कुटिलता, घृणा, द्वेष का शोर,
कहीं किसी का गर्व, अवमानना का शोर,
कहीं किसी का प्रेम, मतभेदों का शोर,
कहीं किसी की प्रगति, ईर्ष्या का शोर,
कहीं किसी की दुर्गति, उपेक्षाओं का शोर ,
कहीं किसी का भाषण, विवेचनाओं का शोर,
कहीं जानवरों का क्रंदन, मूकता का शोर,
कहीं किसी का स्वार्थ, अधीरता का शोर,
आत्मा का बिलखना, करुण पुकार का शोर,

कानों को बधिर करता,
आँखों को बोझल करता,
पैरों को काट देता,
पदचिन्हों को मिटा देता,
भावनाओं को कचौटता,
सपनों को रोंद्ता,
ह्रदय को टुकडों में बाँटता,
टुकडों को भी काटता,
आशाओं को जलाता,
आत्मा को रुलाता,

यह शोर, आख़िर आया कहाँ से?
कौन मचा रहा है?
मैं, तुम, या हम सब?
क्यूँ नही छोड़ देते इस पापी को जिसे हमने ही अपनाया है?
क्यूँ नही मोड़ देते इस बवाल को जिसे हमने ही उठाया है?

इस शोर को मिटाना होगा, इस दानव को मिटाना होगा,
नहीं तो इस शोर में खो जायेंगे हम सब, यह प्रकृति,
यह इश्वर की अनमोल कृति,
सब कुछ भांप बन कर उड़ जाएगा !
और बच जाएगा यह शोर,
अपनी भूख मिटाने के लिए किसी और सभ्यता की तलाश में !

शब्दों के जंगल में ....

शब्दों के जंगल में ,शान्ति लिए ,
निकल पड़ी हूँ मन में ,क्रान्ति लिए !
शोर ही शोर , देखूँ चहूँ ओर ,
जैसे सावन से रूठा हो मोर ,
कलरव भी लागे है ठीकरे सा खाली ,
बजे न मृदंग , है कर्कश सी ताली ।
पेडों पे लागे न अम्बुआ का मोर ,
सूनी सी लागे है आँगन की भोर ,
पाखी न छेड़े वो मस्ती की तान,
नैनों में सपनों का पंछी बेभान,
उड़ने को पंख जो मैंने पसारा ,
रोता सा दिखा एक चेहरा वो प्यारा ,
छूने अम्बर मैं उड़ना जो चाहूँ ,
विकल हो फ़िर मुड़ना ही चाहूँ .
जानूँ न चाहे क्या मेरा सितारा ,
दूर से मुस्काता , फिरता आवारा ,
आशाएँ मन की गाती यह गान ,
"गंतव्य होगा कोई तो महान ,
जीवन के पथ पर देर सवेर ,
मिल ही जाएगा इस चिडिया को डेर !"

क्षितिज के पार ....

पृथ्वी से पृथक हो कर,
समय के गर्भ से बहार,
जिन्दगी के पुल से ऊपर,
जाना चाहूंगी उस क्षितिज के पार।

जहाँ मिल जाते धरा व गगन,
जहाँ समागम हो प्रकाश अंधकार,
जहाँ एक रूप हो सबका प्यार,
जाना चाहूंगी उस क्षितिज के पार।

जहाँ धूप छाँव में ना हो कोई अंतर,
हर हाल में मन गाए निरंतर,
सुख दुख में हो साम्य विचार,
जाना चाहूंगी उस क्षितिज के पार

जहाँ मन सुन्दर है हो जाता,
और निर्गुण रूप में खो जाता,
जहाँ हो सगुण ब्रम्ह का दर्शन द्वार,
जाना चाहूंगी उस क्षितिज के पार।

मेरी ज्ञान गंगा पर, जिस सिंधु का है एकाधिकार,
जहाँ मेरा प्रेम कर जायेगा मेरा उद्धार,
जहाँ मिल जाएगा मुझे इस जीवन का सार,
जाना चाहूंगी उस क्षितिज के पार

मम प्रश्नोत्तर !

जीवन पथ पर जैसे तैसे,
गिरते, उठते, रुकते, चलते,
प्रश्न एक आ गया मचलते-

"क्यों जीवन में दृश्य बदलते?
क्यों है क्षण में भंगुर हर सुख?
क्यों सदैव रहता है कोई दुख?
सुनते रहे सदियों यह बात,
उषा आती हर रात्रि के बाद,
क्यूं नही है उषा ये लंबी?
क्यूं लगती ये इतनी दंभी?
क्यूं हर सुख है पल भर का?
क्यूं हर दुख जीवन भर का?

चलती रही इस प्रश्न को लेकर,
अकसमात ही आया एक उत्तर -

"दुख के बिना नही सुख का मोल,
दुख की महत्ता का अधिक है तोल,
जब तक दुख का ज्ञान नही है,
तब तक सुख का मान नही है,
दुख से ज्ञान यदि ले लोगे,
सुख क्षण में सदियाँ जी लोगे!"

मैने विस्मय से देखा इधर उधर,
कहाँ से आया है ये उत्तर मधुर?
पाया, अंतरमन से आवाज़ है आई,
मन ने मुझमें है शक्ति जगाई,
सुख-दुख की परिभाषा समझाई,
जीवन में नव ज्योति जगाई !

श्याम कहो तुम क्यूं नही आए?

दिन रात निहारे राह सदा से,
बैठे रहें हम आँख बिछाए,
रात ना बीते, दिन दरस ना दिखाए,
श्याम कहो तुम क्यूं नही आए?

करके वादा भूल गये तुम,
हमको आधा छोड़ गये तुम,
अपना कह के बने पराए,
श्याम कहो तुम क्यूं नही आए?

तुम्हरी रानियाँ, सुंदर काँचन,
हम वृंदावना-गोपी-अश्वेता,
इसलिए हमारा प्रेम दिए भुलाए?
श्याम कहो तुम क्यूं नही आए?

श्याम कहाँ है हृदय तुम्हारा?
क्या कहीं तुम बाँट हो आए?
बरसों रहे तुम हमें सताए,
श्याम कहो तुम क्यूं नही आए?

संगीत

प्राणो का आधार यही है,
जीवन की झंकार यही है,
हर कण में संगीत बसा है,
परमेश्वर का प्यार यही है

सात सुरों की मधुरिमा का,
अप्रतिम विस्तार यही है,
भावनाओं की अभिव्यक्ति का,
स्नेहमय संसार यही है,

हृदय का स्पंदन हृदयंगम हैं,
श्वांस में सुरों का संगम है,
हर तार की हर तरंग में,
जीवंतता की नयी उमंग है

तमस को ज्योति स्वरूप दे,
ऐसा 'दीपक' राग यही है,
प्राणों की त्ृष्णा को तृप्ति दे,
राग 'मेघ मल्हार' यही है

धर्म जाति में भेद ना जाने,
संकीर्णता का उपचार यही है,
प्रेम ही बाँटे, प्रेम सिखाए,
भावनाओं का अंबार यही है

मनुजता का आभूषण है
मनुज का उद्धार यही है
असहिष्णुता की आँधी में,
अचल अडिग दीवार यही है

सुख की आँधी, दुख की वर्षा,
हर मौसम का प्यार यही है
जीवन के हर मोड़ की व्याख्या,
करता हर 'आकर' यही है

जीवन सीमाओं से मुक्त है
क्षितिज के उस पार यही है
आत्म-परमात्म के संबंधों का,
विस्तृत आधार यही है

ज़ीवन की लयबद्धता का,
सृजन का सब सार यही है
संगीत से जीवित हर कण है
संगीत बिना संसार नही है !

तेरी राह देखूं, तेरी चाह देखूं

हृदय के अंतर में, तेरा रूप देखूं,
बूँद और समुंदर में, तेरी धूप देखूं,

फूलों में कलियों में, तेरा रंग देखूं,
साँसों की गलियों में, तेरी तरंग देखूं,

नदियों में झरनों में, तेरी मस्ती देखूं,
पर्वत की छोटी पे, तेरी हस्ती देखूं,

सूरज में चंदा में, तेरी रोशनी देखूं,
रातों की गहराई में, तेरी शांति देखूं.

सुख में और दुख में, तेरा ही नेम देखूं,
भीड़ में, एकाकी में, तेरा ही प्रेम देखूं.

हर तरफ़ हर जगह पर तू ही तू है छाया,
मेरे कण-कण को तूने ही, प्रेम से सजाया.

तेरे इस सागर में हूँ, उमड़ी- घुसड़ी सी एक लहर,
लौट कर तुझमे समा जाऊं, सोचती मैं वह पहर.

विचलित हो तुझको खोजूं, क्यूं ना तू अपनाता मुझे,
क्यूं किया है ख़ुद से अलग, क्यूं है तू भरमाता मुझे?

तेरी ही एक बूँद हूँ प्यासी, तृप्ति हो कर भी उदासी,
तेरे रूप में मिल जाने की बस में बात देखूं.

तेरी राह देखूं, तेरी चाह देखूं
तेरी राह देखूं, तेरी चाह देखूं

मैं अब चली हूँ सत् की डगर...

मैं अब चली हूँ सत् की डगर,
ना है रोग मुझको, ना कोई है डर,
माता सी धरती, पिता सा अंबर,
सत् का है रास्ता, सत् का सफ़र !

पहले थी गिरती, उठती थी, चलती,
ढूँदती थी बस लक्ष्य को नज़र,
थक हार बैठी, जब झुका यह सर,
तब पाया मैने आप ही को गुरूवर् !

जीवन में मेरे फिर हुई भोर,
आपने दिखाई सुनहरी वह डोर,
दिया मेरे हाथ में उसका एक छोर,
थामे उसे मैं चलूँ लक्ष्य ओर.

बढ़ती हूँ आगे, मन गीत गाये
ना सुध कोई मुझे कौन आए, कौन जाए,
आपको ही देखे, यह मन मुस्कुराए,
ऐसे ही मेरा हृदय प्रेम पाए.

जानूँ ना कैसी है आगे डगर यह,
इसी डोर को थामे चलते है रहना
और अगर कभी जो क़दम डगमगाए,
मुझे देख लेना, है इतना ही कहना.

मैने है छोड़े भ्रम के उजाले,
मुझको नही रास आते ये प्याले,
मुझे प्यास है ज्ञान की, तुम हो तृप्ति,
मुझे है मुक्त होना, तुम ही से मुक्ति.

मैं अब चली हूँ सत् की डगर,
ना है रोग मुझको, ना कोई है डर,
माता सी धरती, पिता सा अंबर,
सत् का है रास्ता, सत् का सफ़र !

स्वप्न

सपनों की ऊँची उड़ान है,
सपनों का सुंदर मकान है,
स्वप्न है जल से अविरल निर्मल,
स्वप्न हैं भावनाओं से कोमल.

मेरी पलकों की छाया में,
एक स्वप्न यूँ ही आ के बसा था,
मैं चंद्रिका बन छाई थी,
चहूं ओर यही दृश्य रचा था.

सिमट के जैसे सारी वसुधा,
मुझे देखने को आई थी,
कण-कण झूम रहा था कांतिमय,
धवल चाँदनी घन छाई थी.

अहा ! कितनी सुंदर थी मैं !
मुझसा कोई ना वहाँ था उज्जवल !
हर मुख पर मेरा प्रकाश था !
मुझसे दीप्तिमान था हर पल !

तभी कहीं से मंजुल इक स्वर,
मन के तार बजाता आया,
रूप रंग का भान था छूटा,
साँसों में वह आके समाया.

ईर्ष्या-ज्वलंत ज्वाला ने,
मुझे अंदर तक था भस्म किया,
जल-जल कर कराहते ,
मेरे 'अहं' ने उससे प्रश्न किया -

" हे पक्षी ! क्या तेरे चक्षु,
प्रकाश में अंधुक हो जाते?
तू जो मुझको देख ही लेता,
तेरे 'स्वर-कण' भी धुल जाते !

तेरा रंग है कला,
तभी तू सामने आने से डरता है,
मैं हूँ सुंदर उज्ज़वला, सो,
मुझको अनदेखा करता है ? "

पक्षी के काले चेहरे पर
उभरी एक ज्योति निश्चल,
उज्जवल रवि-किरण सा प्रस्फ़ुट
उत्तर मधुरम आया उस पल -

"हे चंद्रिका, तू है सुंदर,
तेरी विभा है सबसे निराली,
पर तेरी 'उजली छाया' भी,
बदलेगी ना देह ये काली.

मेरी मंजुल स्वर गंगा में,
बहने वाली रूप-गर्विता,
देख है डूबा हर कण तेरा,
सुर-सागर में बन के सरिता.

क्या तुझको है विदित नही यह,
कहाँ से आई तेरी रोशनी?
क्या तू भूल गयी है
प्राची बन जाएगी तेरी भेधिनी?

सूर्य की किरणों मे धुल कर,
तू हो जाती है पल में ओझल,
पर मेरे सुरों की गंगा,
बहती तब भी यूँ ही कल-कल !

किस काम की तेरी कांति,
जिससे सत्य उभर ना पाता,
चकाचौंध से तेरी कह,
क्या जीवन किसी का सुधर भी पाता?

अर्ध-सत्य है भूलभुलैया,
भटक रही है तू बेबान,
हृदय को अपने धवल कांति दे,
त्याग भी दे अब तू अभिमान !

क्यूं आई है जन्म तू लेकर,
पूरा करने कौन सा काम?
पहचान कौन है तू?
कहाँ है तेरा ईश्वर विध्यमान !

ढूँढ हृदय के हर कोने में,
कहाँ छुपी वह ज्योति महान
कर जीवन को सिद्ध, पहुँच जा,
अपने सत्य के ज्योति धाम !

जिसने रचा मुझको-तुझको,
किया रूप-सुर से धनवान,
जिसने ज्ञान का स्रोत बनाया,
क्यूं ना करे उसका ही ध्यान ! "

उन शब्दों ने मेरे
अंतर-घट को था झंझोड़ दिया,
एक तीव्र किरण सी उभरी,
जिसने स्वप्न को तोड़ दिया !

पक्षी, सुर, कांति व चंद्रिका,
हो चुके थे सारे ओझल,
पर वे शब्द अब भी गूँजित हो,
मचा रहे हैं मन में हलचल.

स्वप्न था सुंदर, स्वप्न था कोमल,
स्वप्न ने था ज्ञान दिया,
नमन है शत-शत उस ईश्वर को,
जिसने स्वप्न में भान दिया !

पल

पल की कहानी बड़ी निराली,
पल में कही ना जाए डाली,
हर पल नये ही रूप में आए,
फिर वह जाने क्या दिखलाए,
पल में आदि, पल में अंत,
पल को भी पर हाथ न आए,
पल में ख़ुशी, पल में आँसू,
पल ही पल पल को तरसाए,
कभी पल, पल भर में खो जाए,
कभी पल भर भी न कट पाए,
जीवन की भाव-भंगिमाओं को,
हर नव पल नये ढंग से सजाए,
चाहे लाख अंधेरा छाए,
पल में दीपक उसे मिटाए,
स्वप्निल नींदों की रातें भी,
पल भर में ओझल हो जाए,
हर पल एक एक साँस गिनाए,
हर पल, पल का मोल सिखाए,
हर पल किसी पल की याद में जाए,
हर पल किसी पल को याद आए,
पल में जीवन भंग हो जाए,
पल में नव जीवन मिल जाए,
तो आओ पल में जीवन जी लें,
अगले पल को इस पल से सजायें !